आदमी एक तीन मंज़िला मकान है। उसका दुर्भाग्य है कि वो अपनी पूरी ज़िंदगी छत पर टहलते हुए ही गुज़ार देता है। आपको भीतर आना होगा। आपको अलग-अलग कमरे में जाकर देखना होगा कि वहां क्या क्या खज़ाना रखा है? ठीक ऐसे ही हमारा मन है। ऊपर ऊपर जो दिखता है वो पानी के बुलबुले सा मिट जाता है। इसे हम चेतन मन कहते हैं। कि किसी ने दरवाज़े की घन्टी बजाई और आपने उठकर दरवाजा खोल दिया। लेकिन, जब आप अपने भीतर उतरते हैं, अपने अवचेतन मन को टटोलते हैं तो आप पाते हैं कि वहां एक खज़ाना पड़ा है। जो आपके व्यक्तित्व को गढ़ता है, आपको निखारता है और आपको जीने का एक अलग अंदाज़ देता है। इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम अवचेतन मन को गहराई से समझें। उसमें विचारों के ऐसे बीज बोयें जिनसे खुशियों की एक उन्नत फसल पनप सके। याद रखिये, चुनाव आपका है। या तो आप छत पर टहलते हुए ज़िंदगी गुज़ार दें या फिर भीतर कमरे में जाकर उसे सजा लें। अपने माइंड को ट्रेंड कर आप जीवन में वो सब पा सकते हैं, जो इस दुनिया में मौजूद है।


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